मंगलवार, 10 मई 2011

दुन्ध्ले सपने

घुल गया है मानो आँखों में नमक ..
 फीकी सी हो रही है धूप की चमक.
 लग रहा क्यों आसमान धुंधलाया 
हर फूल लग रहा है कुम्हलाया.. अरे .......
याद आया आज भी मैं रोई थी . गुज़र रहा था जब कुछ .....
तब क्या मैं सोई थी ?
सोचती हूँ!!!!!!!!
नींद पूरी हो गई अब तो मैं जागूँ किस्मत से "अपने" लिए कुछ न कुछ माँगूं. 

और बस .आवाज़ हुई छन् से एक नींद मेरी खुल गई ...
अरे ....
मैं तो सचमुच में सोई थी जाने कैसे झूठे ...सपनों में खोई थी ..

 लग रहा है आँखों में अब भी नमक
 अब भी है फीकी धूप की चमक
लग रहा है आकाश अब भी धुंधलाया

 लग रहा है हर फूल अब भी कुम्हलाया 
मैं तो सचमुच में रोई थी 
रोते -रोते सोई थी